अमूर्त कला : अरूप में रूप की खोज और मानवीय चेतना का विस्तार

मनुष्य का अनुभव जगत केवल वही नहीं है जो आँखों से दिखाई देता है; उससे कहीं अधिक वह है जिसे हम महसूस करते हैं, कल्पना में गढ़ते हैं, या अंतर्मन में अनुभव करते हैं। दृश्य और अदृश्य, गोचर और अगोचर—इन दोनों के बीच ही जीवन का वास्तविक विस्तार स्थित है। कला, विशेषकर अमूर्त कला, इसी … Continue reading अमूर्त कला : अरूप में रूप की खोज और मानवीय चेतना का विस्तार