कला बनाम कला का बाजार

A woman in traditional attire milking a cow while holding a child on her back, with various pots nearby.

राजा रवि वर्मा की 167 करोड़ में बिकी पेंटिंग जो अब भारत की सबसे महंगी पेंटिंग हो गई है।

हॉलीवुड की एक बड़ी मशहूर फ़िल्म है, द परफेक्ट मर्डर, जिसमें एक रोल एक चित्रकार का है। जब वह चित्रकार एक धनी व्यक्ति के बुलावे पर उसके घर जाता है तो वहाँ लगी पेंटिंग और शिल्प देखकर कहता है कि अमीर लोग एक जैसी चीजें ही खरीदते हैं। यह संवाद अचानक याद आने का कारण है राजा रवि वर्मा की पेंटिंग यशोदा और कृष्ण का सबसे अधिक मूल्य में बिकना। करीब 167 करोड़ रुपए में बिकी यह पेंटिंग अब भारत की सबसे महंगी पेंटिंग हो गई है। इस खबर से कलाकार खुश हैं, वह भी जिनकी पेंटिंग हजारों में भी नहीं बिक पाती हैं। इससे कला का विकास माना जाए, इसे लेकर मैं बहुत आश्वस्त नहीं हूँ। अब राजा रवि वर्मा की पेंटिंग आज 167 करोड़ में बिकी है तो कल यही पेंटिंग 200 करोड़ में बिक सकती है या हुसेन अथवा किसी और कलाकार की पेंटिंग इससे अधिक क़ीमत में बिक सकती है। पर इससे भारतीय कला का विकास कैसे होगा, यह समझना मुश्किल है, हाँ इससे भारतीय कला का बाजार जरूर विकसित हो सकता है। मैं बाजार के खिलाफ नहीं हूँ, उसे बढ़ना चाहिए, पर इस बाजार में हिस्सेदारी कुछ कलाकारों और गैलरियों तक सीमित रहे, तो उसे कोई स्वस्थ स्थिति नहीं माना जा सकता। जो लोग एक पेंटिंग पर कई करोड़ रुपए खर्च कर रहे हैं, वह यदि एक की जगह कई कलाकारों का काम खरीदते हैं तो जरूर कला और कलाकारों का विकास हो सकता है। इस खरीद की प्रक्रिया में नीलामी संस्थाओं, गैलरियों के बिना भी कलाकारों के साथ सीधी खरीद हो तो उससे बढ़िया कुछ नहीं हो सकता।

यहाँ कोई बीस साल पहले कुछ कलाकारों के साथ कला बाजार को लेकर हुई चर्चा याद आती है जिसमें अमिताव दास, गोपी गजवानी, शमशाद, जय झरोटिया, नंद कत्याल, प्रेम सिंह, अर्पणा कौर सहित अनेक कलाकारों से मैंने कला बाजार के उफान पर उनकी राय जाननी चाही थी। यह वह समय था जब भारतीय कला की दुनिया में एक नया तेवर आया था। अचानक नीलामियों की चर्चा होने लगी थी, कलाकृतियों को निवेश का विषय मान लिया गया था, रातों-रात कलाकारों की कृतियों की कीमत बढ़ रही थी। जो लोग महंगी पेंटिंग नहीं खरीद पा रहे थे वह नये कलाकारों की सस्ती पेंटिंग खरीद रहे थे। दिल्ली और मुंबई सहित अन्य जगहों पर अचानक नई गैलरियाँ परिदृश्य पर सक्रिय होती दिखाई दे रही थीं। उस समय ज्यादातर कलाकारों का मानना था कि बाजार कला को नहीं बना सकता, और यह कि कला बाजार में जो तेजी दिखाई दे रही है, यह लंबी नहीं चलेगी। यही हुआ भी, 2008 में मंदी का दौर शुरु हुआ और अचानक कला के खरीददार परिदृश्य से गायब होने लगे। पेंटिंग्स की कीमत कम होने लगी। कला बाजार के उस विकास ने कला को भी शेयर बाजार की तरह दो श्रेणियों में विभाजित कर दिया था। कुछ कलाकार ब्ल्यू चिप कंपनियों की तरह हो गये थे जबकि ज्यादातर बाकी कलाकार उन सामान्य कंपनियों की तरह हो गये थे जिनके शेयरों में कोई निवेश करना पसंद नहीं करता। आज बीस साल बाद भी स्थिति लगभग वैसी ही है, अलबत्ता इस बीच कई दूसरे कलाकार ब्ल्यू चिप कंपनियों की तरह स्थापित हो गये हैं, पर ज्यादातर कलाकारों के लिए स्थिति में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आया है।

कला और कला बाजार, दोनों अलग-अलग दुनिया हैं। जहाँ कला है, वहाँ जरूरी नहीं है कि बाजार भी हो, और जहाँ बाजार है, वहाँ कला हो यह भी जरूरी नहीं है। ऐसा नहीं कि राजा रवि वर्मा की जो पेंटिंग रिकॉर्ड कीमत पर बिकी है, वह कलाकृति नहीं है, पर उसकी कीमत के पीछे कला मूल्य की कोई भूमिका नहीं है। कला मूल्य और कला का मूल्य इन दोनों में बड़ा फर्क है। बहरहाल, राजा रवि वर्मा की एक पेंटिंग की रिकॉर्ड तोड़ कीमत की चर्चा अभी ठंड़ी भी नहीं हुई है कि उनकी उस पेंटिंग की मौलिकता को संदिग्ध करार दिया जाने लगा है।

-डॉ वेद प्रकाश भारद्वाज

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