आसान है, पर आसान नहीं: पंकज झा की अमूर्त कला

A group of seven men posing for a photo in an art gallery, standing in front of a large white wall with an abstract painting. Behind them, a woman is seen in the background, slightly out of focus.

समकालीन कला परिदृश्य में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जिनकी रचनाएँ देखने भर से नहीं, बल्कि ठहरकर महसूस करने से खुलती हैं। पंकज झा उन्हीं कलाकारों में से एक हैं। चित्रकला में पटना से स्नातक पंकज झा ने अभिनय और कविता के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। एनएसडी से अभिनय की शिक्षा लेने के बाद वह मुंबई चले गये जहाँ कई फिल्मों और वेब सीरिज में उन्होंने काम किया है, जिनमें मिर्जापुर और पंचायत उल्लेखनीय है। अभिनय के साथ ही वह लगातार चित्रकला में भी सक्रिय हैं। वह पेंटिंग्स के माध्यम से एक नई संवेदनात्मक दुनिया रचते दिखाई देते हैं। पिछले दिनों जहांगीर आर्ट गैलरी, मुंबई में उनकी एकल प्रदर्शनी हुई थी, और अब उनकी एकल प्रदर्शनी, नई दिल्ली के त्रिवेणी कला संगम स्थित श्रीधरणी गैलरी में 29 अप्रैल 2026 को आरंभ हुई, जिसमें प्रदर्शित सभी चित्र श्वेत-श्याम रंगों में रचे गए हैं।

Two black and white abstract paintings hanging on a gallery wall, featuring vertical lines and blurred landscapes.

पहली दृष्टि में ये चित्र सरल प्रतीत होते हैं—रंगों की सीमितता, आकृतियों का धुंधलापन और अमूर्तता की सहजता—परंतु यही सरलता अपने भीतर एक गहरी जटिलता समेटे हुए है। स्वयं उनकी कविता के रूप में-

इतना आसान है

इसीलिए

इतना आसान नहीं है…

यह कविता उनकी कला का मूल बिंदु है, जहाँ अमूर्तन केवल शैली नहीं, बल्कि अस्तित्व के गहन प्रश्नों से जुड़ा हुआ अनुभव बन जाता है। उनकी पेंटिंग्स को देखते हुए पुरानी श्वेत-श्याम फिल्मों के कई दृश्य याद आने लगते हैं तो कई बार कुछ छायाचित्र स्मृति में जगमगाने लगते हैं।

Two abstract black and white paintings displayed on a wall.

पंकज झा की चित्रकृतियाँ किसी एक निश्चित रूप या अर्थ में बंधी नहीं हैं। उनमें अनेक दृश्य एक साथ उपस्थित होते हैं—कहीं कोयला खदानों या क्षितीज का धूसर परिवेश, कहीं किसी निर्जन नदी का एकांत किनारा, कहीं दूर बसे गाँव की धुंधली स्मृति। ये दृश्य स्पष्ट होकर भी अस्पष्ट रहते हैं, मानो स्मृति और वर्तमान के बीच कहीं अटके हुए हों। श्वेत-श्याम रंगों का चयन यहाँ केवल दृश्यात्मक प्रभाव के लिए नहीं, बल्कि समय, स्मृति और अनुभूति के गहरे संबंधों को व्यक्त करने का माध्यम बन जाता है।

An abstract painting featuring shades of black and gray, depicting textured shapes and blurred forms, displayed on a wall with soft lighting.

इन चित्रों के साथ प्रदर्शनी के कैटलॉग में शामिल पंकज झा की लघु कविताएँ भी उल्लेखनीय हैं। तीन पंक्तियों में सिमटी ये कविताएँ शब्दों में सीमित होते हुए भी अर्थ में अनंत हैं। उनकी एक कविता—
“कुछ तुम समझो,
कुछ हम समझें,
कुछ नहीं समझने के लिए…”
—दरअसल उनकी कला को समझने की कुंजी प्रदान करती है। यहाँ ‘न समझना’ भी एक वैध अनुभव है, एक ऐसी स्थिति जहाँ तर्क का आग्रह समाप्त हो जाता है और अनुभूति का विस्तार शुरू होता है।

Abstract monochrome painting depicting a textured landscape with varying shades of black, gray, and white, featuring subtle highlights resembling distant stars.

पंकज झा की पेंटिंग्स में बार-बार एक द्वंद्व उभरता है—होने और न होने का, दिखने और अदृश्य रहने का, समझने और न समझने का। उनकी रचनाएँ दर्शक को किसी निष्कर्ष तक पहुँचाने के बजाय एक प्रक्रिया में शामिल करती हैं। हर चित्र एक कविता की तरह है, जिसे खोलना पड़ता है, और उसी प्रक्रिया में दर्शक स्वयं भी खुलता है।

A group of four people seated in an art gallery, smiling at the camera. Two men are in the foreground, one of whom is holding a phone and the other is wearing a black shirt. Two women are seated next to them, one wearing a light blouse and the other with glasses, both holding bags. A man appears in the background.

समकालीन कला में, जहाँ त्वरित अर्थ और स्पष्ट संदेशों की अपेक्षा बढ़ती जा रही है, वहाँ पंकज झा की कला एक विराम की तरह आती है। यह हमें सिखाती है कि हर चीज़ को तुरंत समझ लेना आवश्यक नहीं है; कुछ अनुभव ऐसे होते हैं जिन्हें समय, धैर्य और संवेदनशीलता के साथ महसूस करना पड़ता है।

यही कारण है कि उनकी कला “आसान” होते हुए भी “आसान नहीं” है—क्योंकि वह हमें देखने से आगे बढ़कर अनुभव करने की चुनौती देती है।

डॉ वेद प्रकाश भारद्वाज

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