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शोभा नागर की कला

सभी कलाएं वस्तुतः भावनाओं और विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम हैं। साहित्य में लेखक भाषा के माध्यम से भावों को व्यक्त करता है तो चित्रकला में चित्रकार के पास अपनी बात कहने के लिए रंग और आकार हैं। नृत्य में शारीरिक मुद्राएं काम करती हैं तो संगीत में स्वर। पर इन सब कलाओं में चित्र व शिल्प को अधिक प्रभावी माना जाता है क्योंकि इसके माध्यम से अभिव्यक्ति को ग्रहण करने के लिए व्यक्ति को किसी विशेष प्रशिक्षण या कौशल की आवश्यकता नहीं होती है। भावक के लिए किसी चित्र को देखते हुए बड़ी सहजता से उससे जुड़ना संभव है, जब तक कि उसमें कलाकार ने कुछ ऐसा न किया हो जो विचित्रता या रहस्य का आभास कराए, जैसे अमूर्त कला। पर ज्यादातर कलाकार ऐसी कला करते हैं जो सीधे- सीधे दर्शक से जुड़ जाती है। शोभा नागर की कला भी ऐसी ही कला है।

शोभा नागर ने दिल्ली के जामिया मिलिया विश्वविद्यालय के कला विभाग से पेंटिंग में एमएफए किया है। कला शिक्षा के दौरान उन्होंने कई माध्यमों में काम किया जिनमें ग्राफिक भी शामिल है। शोभा नागर के लिए कला जीवन को एकांतिक की जगह सामाजिक होने का एक सशक्त माध्यम है। मूलतः आकृतिमूलक कला करने वाली शोभा नागर के यहां, संरचना के स्तर पर लगातार एक खोज चलती रहती है। व्यक्ति चित्रण की उनकी शैली मानवीय रूप को एक आकार से ऊपर उस भाव स्तर पर ले जाती है जहां मनुष्य को मनुष्य होने का अहसास होता है। इसीलिए शोभा की कला श्रृंगारिक होते हुए भी विचार पर अधिक निर्भर है। जीवन में राग-वीराग की स्थितियों का प्रातिनिधिक पर सूक्ष्म चित्रण शोभा के काम की विशेषता कही जा सकती है।

मानवीय भावनाओं का चित्रण हमेशा से कला के केंद्र में रहा है पर शोभा नागर की कला भावनाओं के साथ ही मानसिक अवस्था को भी उजागर करती हैं। व्यक्ति चित्रण उनके यहां अधिक मिलता है, उसमें भी चेहरों की प्रधानता होती है। चेहरा मन का दर्पण होता है। मन में उठ रहे भावों के साथ ही दिमाग़ में आते जाते विचार भी चेहरे पर आसानी से पढ़े जा सकते हैं। शोभा नागर इसे अपनी पेंटिंग्स में बेहतर तरिके से उभारने में सफल रहती हैं। इसके लिए वह यथार्थवादी शैली की जगह मिश्रित शैली का प्रयोग करती हैं। उनकी कला में चेहरे अपनी संरचनात्मक अवस्था में होते हैं पर उसके साथ ही अमूर्तन का संयोजन भी दिखाई देता है। यह हकीकत है कि एक मनुष्य के रूप में हमारे मन और मस्तिष्क में एक ही समय में अनेक विचार और भाव संचारित होते रहते हैं। उनमें से कुछ हमारे चेहरे या क्रियाकलाप से अभिव्यक्त हो जाते हैं तो कई अव्यक्त ही रह जाते हैं। शोभा की पेंटिंग्स में ऐसे अव्यक्त रह गये भाव अमूर्तन से स्तर पर प्रतिनिधित्व पाते हैं।

अमूर्तन के प्रयोग से वह अपने  चित्रों में एक रहस्य स्थापित कर देती हैं जो दर्शकों को चित्र से संवाद कर उस रहस्य को खोलने के लिए आमंत्रित करता है।  यह रहस्य दर्शकों को उनकी पेंटिंग्स के माध्यम से जीवन की उन परतों पर विचार के लिए उकसाता है जो ज्यादातर उपेक्षित रह जाती हैं, या जिन्हें जानने और समझने का प्रयास नहीं किया जाता है। यहीं से शोभा की कला एक नया मोड़ लेती है और वह जीवन की सपाट पगडंडी को छोड़कर उन कटीली राहों पर चलने लगती है जिसमें आंदोलित भावों और विचारों का उलझाव दिखाई देता है। इस तरह शोभा की कला एक दृश्य से अधिक विचार में बदल जाती है।

  • डॉ वेद प्रकाश भारद्वाज

One response to “शोभा नागर की कला”

  1. Binay Kumar Rawal Avatar
    Binay Kumar Rawal

    Waah

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