
दुनिया के सभी समाजों में मुखौटा कला का लंबा इतिहास रहा है। कहीं यह उत्सव के रूप में चलन में रही है तो कहीं यह धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा रही है। ओडिशा में मुखौटा कला की परंपरा ऐतिहासिक व सांस्कृतिक रुप से अति-समृद्ध रही है। यह कला मुख्य रूप से ग्रामीण इलाकों, पारंपरिक नृत्यों और धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़ी हुई है।

ओडिशा की मुखौटा बनाने की परंपरा भारत की एक प्राचीन लोक शिल्प कला है। ओडिशा में इसका उपयोग सदियों से नाटकों, जत्रा (लोक नाटक), स्वांग (बहरुपिया प्रदर्शनकारी कला) और रासलीला जैसे पारंपरिक नृत्यों-नाटकों में पात्रों को जीवंत करने के लिए किया जाता रहा है।

ऐतिहासिक रूप से, ये मुखौटे विभिन्न माध्यमों से बनाए जाते रहे हैं, जिनमें कागज की लुगदी (पेपर मेशे), लकड़ी, सोलापिथ (सोल का फूल), और गोबर शामिल हैं। कागज़ की लुगदी वाले मुखौटों को ‘ओडिया मुखा’ के रूप में जाना जाता है। कागज की लुगदी और लकड़ी के मुखौटे अधिक चलन में रहे हैं क्योंकि यह लंबे समय तक उपयोग में आ सकते हैं। लकड़ी के मुखौटे आदिवासी समाजों में भी चलन में रहे हैं।

ओडिशा में मुखौटे मुख्य रूप से लोक नाटकों, नृत्य और अन्य सांस्कृतिक आयोजनों में होता रहा है। रामायण, महाभारत और पौराणिक कथाओं के पात्रों (जैसे हनुमान, नरसिंह, रावण, देवी) के लिए मुखौटे का चलन रहा है। दशहरा, जन्माष्टमी और अन्य त्योहारों के दौरान इन मुखौटों का उपयोग स्थानीय लोगों द्वारा कहानी सुनाने समय किया जाता है।
ओडिशा के मयूरभंज क्षेत्र में होने वाला प्रसिद्ध ‘छाऊ नृत्य’ इन मुखौटों के बिना अधूरा माना जाता है। ये मुखौटे नृत्य के नाटकीय प्रभाव को बढ़ाने के लिए जीवंत रंगों और विस्तृत सजावट के साथ बनाए जाते हैं।
ओडिशा के गंजम जिले का चढ़ियापल्ली गाँव पारंपरिक मुखौटा निर्माताओं का एक प्रमुख केंद्र है, जहाँ मुख्य रूप से विश्वकर्मा समुदाय के कारीगर इस कला को पीढ़ियों से जीवित रखे हुए हैं। इस कला का अब विस्तार हो गया है और शहरी क्षेत्रों में अन्य समुदाय के लोग भी इसकी रचना करने लगे हैं। इन मुखौटों का प्रयोग अब घरों को सजाने के लिए भी होने लगा है, इससे इनका बाजार बढ़ गया है और बड़े स्तर पर इनका निर्माण होने लगा है।
सभी छवियाँ गूगल से साभार।

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