पुस्तक परिचय
पुस्तकः सुधीर पटवर्धनः जन का कलाकार
लेखकः कुमार अनुपम
प्रकाशकः रबींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय
संस्करणः 2025
मूल्यः 1000 रुपए (पेपरबैक संस्करण)

एक कलाकार जो कुछ रचता है वह अक्सर उसके दृश्य अनुभव का प्रमाणिक हिस्सा होता है, विशेषरूप से आकृति -प्रधान चित्र रचने वाले कलाकारों पर यह बात लागू होती है। पर कुछ कलाकार ऐसे भी होते हैं जो अपने दृश्यात्मक अनुभव को विस्तार देते हुए ऐसी रचनाएँ प्रस्तुत करते हैं जिनमें दृश्यात्मक अनुभव से अधिक अनुभूति और आलोचनात्मक दृष्टि महत्व रखती है। सुधीर पटवर्धन ऐसे ही कलाकार हैं। उनके यहाँ जो कुछ दिखाई दे रहा होता है, उसमें गहन आलोचनात्मक दृष्टि का विस्तार दिखाई देता है। इस आलोचनात्मक दृष्टि को किस तरह चित्र-भाषा में रुपांतरित किया गया यह हमें कुमार अनुपम की उनपर लिखी पुस्तक ‘सुधीर पटवर्धनः जन का कलाकार’ से पता चल जाता है। कलाकारों के जीवन और उनकी कला पर अनेक पुस्तकें लिखी गई हैं पर यह पुस्तक कुछ अलग है। इसमें कुमार अनुपम ने सुधीर पटवर्धन के जीवन, और उनके अनुभवों को केंद्र में रखते हुए उनकी कला दृष्टि को खोलने का काम किया है। इसके लिए उन्होंने सुधीर पटवर्धन से कई बार मुलाकात की, उनकी पत्नी से बात की, उनके मित्रों से विचार-विमर्श किया, उनके कामों पर पहले से लिखे गये साहित्य का सहारा भी लिया। यह सब करते हुए लेखक ने इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि पाठ की प्रमाणिकता पर किसी तरह का संदेह न रह जाए।

इस पुस्तक की कोई समीक्षा नहीं हो सकती, सिर्फ परिचय दिया जा सकता है। इसका कारण यह कि इस पुस्तक को एक तरह से सुधीर पटवर्धन की कला-जीवनी कहा जा सकता है। कुमार अनुपम ने सुधीर पटवर्धन के मेडिकल की पढ़ाई करते हुए कला करना, साहित्य में उनकी रुचि, माक्र्सवाद से उनका परिचय, कला की अनौपचारिक शिक्षा आदि को उनके कलाकार के विकास से संदर्भित करते हुए लिखा है। पुस्तक में अनेक रचनाओं पर विस्तार से चर्चा है जो उन कृतियों को समझने में सहायता करती हैं।

सुधीर पटवर्धन की कला केवल देखने वाली कला नहीं है, वह विचार करने वाली कला है। उनकी रचनाओं को देखते हुए कोई भी व्यक्ति सिर्फ उस दृश्य तक सीमित नहीं रह सकता, जो दिखाई दे रहा है। उस दृश्य के साथ राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पक्ष भी नाभी-नालबद्ध हैं। यहाँ तक कि उनके शुरुआती दौर के चित्र, जिनमें व्यक्ति चित्रों की संख्या अधिक है, या एकल मानव चित्रण है, उनमें भी हमें दृश्य से बाहर की उपस्थिति का बोध होता है। सुधीर पटवर्धन तटस्थ नहीं, एक प्रतिबद्ध कलाकार हैं और इसीलिए उनकी रचनाओं में दृश्य से अधिक अवधारणा का महत्व है।

पुस्तक में सुधीर पटवर्धन की जीवन यात्रा के साथ ही कला यात्रा का सिलसिलेवार विवरण है। कुमार अनुपम रचनाओं का विश्लेषण करते हैं पर उसमें किसी तरह के आग्रहों को स्थान नहीं देते हैं। वह सिर्फ उस रचना के संदर्भों को केंद्र में रखते हुए उन्हें खोलने का काम करते हैं। इस खोलने में दूसरों के लिए कलाकृति को अपनी तरह से देखने की संभावना उपस्थित रहती है। पुस्तक में सुधीर पटवर्धन से एक लंबा साक्षात्कार भी है।

पुस्तक का प्रकाशन रबींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय द्वारा टैगोर मोनोग्राफ सीरिज के तहत किया गया है। इस सीरिज के संपादक हैं वरिष्ठ कलाकार व कला लेखक अशोक भौमिक। एक अच्छी बात यह है कि यह पुस्तक दो रूप में है, एक लायब्रेरी संस्करण है और दूसरा पेपरबैक संस्करण। इस तरह यह पुस्तक सामान्य कलाकारों, कला विद्यार्थियों और कला प्रेमियों के लिए भी उपलब्ध है।

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