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वह क्या है जो कला नहीं है?

डॉ वेद प्रकाश भारद्वाज एक स्वतंत्र कलाकार और कला लेखक हैं। विगत 40 वर्ष से कला और कला लेखन में सक्रिय हैं। कला पर आपकी छह पुस्तकें प्रकाशित हैं तथा हजारों लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, वेब पोर्टल आदि पर प्रकाशित हैं।

साइकिल की सीट और हैंडल से बनाया पिकासो का एक शिल्प

अगर सबकुछ कला है तो फिर वह क्या है जो कला नहीं है? यह सवाल जब पिछले दिनों मैंने फेसबुक पर रखा तो काफी लोगों की प्रतिक्रियाएँ मिलीं। बहुत से लोगों ने इसे एक जरूरी सवाल बताते हुए इस पर गंभीर चर्चा की आवश्यकता पर बल दिया। पर, चर्चा करे कौन और कहाँ की जाए, यह तय करना मुश्किल है। मुझे लगता है कि आज जब किसी विषय पर चर्चा के लिए अवसर कम होते जा रहे हैं, विशेषरूप से किसी गोष्ठी या सम्मेलन के रूप में तब हमे वैकल्पिक व्यवस्थाओं के बारे में सोचना चाहिए। मैंने इसीलिए फेसबुक का इस्तेमाल किया। यह चर्चा अभी जारी है।

नीरज शर्मा

बहरहाल, कुछ लोगों की प्रतिक्रियाओं ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। जैसे, वरिष्ठ कलाकार और कला आयोजक नीरज शर्मा लिखते हैं कि मेरे विचार से सबकुछ कला नहीं है, पर हम सबकुछ में कला की खोज करते हैं। नीरज शर्मा की बात सही है, एक कलाकार के रूप में हम सबकुछ में कला की खोज करते हैं। दरअसल कला कोई एक वस्तु नहीं है, एक मानसिक अवस्था है, एक विचार है जो मनुष्य की चेतना का एक पक्ष है। किसी भी रूप को, चाहे वह मनुष्य हो या कोई वस्तु, उपयोगी हो या अनुपयोगी, उसे देखते ही मनुष्य के मन में कई तरह के विचार आने लगते हैं। उसकी चेतना जागृत होती है और वह जो दिखाई दे रहा है, उसमें अपने अनुभव और चेतना के अनुरूप उन भावों, विचारों और रूपों को देखने लगता है जो प्रत्यक्ष नहीं हैं। इसीलिए एक कलाकार के रूप में हम सबकुछ में कला की खोज करने लगते हैं।

अनिल अत्रि

यहाँ कवि अनिल अत्रि की टिप्पणी का उल्लेख करना उचित होगा जो कहते हैं कि ब्रह्मांड में मौजूद हर चीज़, हर घटना, हर वस्तु, हर विचार, जीव-निर्जीव यहाँ तक कि कूड़ा-कचरा भी कला ही है। जहाँ कला नहीं है वहाँ शून्य है, और, शून्य अपने आप में कला है। अनिल जी जब कहते हैं कि कूड़ा-कचरा भी कला है तो स्पष्ट है कि वह उपयोगिता और सौंदर्यानुभूति से ऊपर उठकर किसी भी चीज में उस चेतना की बात करते हैं जो कला का मूल है। किसी प्रतिमा को, या चित्र को देखकर दर्शक की चेतना जागृत न हो, उसका विस्तार न हो तो उस प्रतिमा या चित्र के होने का कोई अर्थ नहीं है। अनिल जी जब शून्य को भी कला कहते हैं तो इस पर विचार किया जाना चाहिए। अक्सर शून्य को लोग नकारात्मक स्थिति मानते हैं, जबकि ऐसा है नहीं। शून्य कभी भी खाली नहीं होता, रिक्त नहीं होता। शून्य उतना ही भरा हुआ है जितना हमारे दृश्य-अनुभव में शामिल भरा हुआ संसार। शून्य अनंत है, उसमें बहुत कुछ होने की संभावना है।

अनिल अत्रि की बात से एक अनुभव याद आता है। बहुत साल पहले, दिल्ली में आर्ट फेयर में एक कलाकार ने रास्ते के किनारे कुछ पत्तों, अखबार के टुकड़ों और ऐसी ही दूसरी चीजों को अव्यवस्थित रूप में संयोजित कर इंस्टालेशन किया था। देखने में वह सब कूड़ा-कचरा ही था, पर उसमें एक कला थी, प्रस्तुति की कला। कला में इस तरह के प्रयोग होते रहे हैं, भले ही ज्यादातर लोगों ने उन्हें पसंद नहीं किया। जिस इंस्टालेशन का जिक्र मैंने किया है, उसे बने डेढ़-दो दशक हो चुके हैं, पर आज देखता हूँ कि किसी भी शहर में चले जाइये, वहाँ कहीं भी आपको वैसे दृश्य दिखाई दे जाएंगे। आज इस गंदगी को लेकर आलोचना होती है, पर एक कलाकार ने कई साल पहले इसकी कल्पना कर ली थी। उसने कूड़े को कला में ही नहीं बदला था, उसने भविष्य को लेकर एक संकेत भी किया था।

यहाँ मुझे कलागुरु विष्णु चिंचालकर की याद आती है जिन्होंने टूटी चप्पल, झाड़ू और ऐसी ही चीजों को एक कलाकृति में बदल दिया था। पिकासो ने साइकिल की सीट और हैंडल से शिल्प बना दिया था। और भी कई उदाहरण हमें मिल जाएंगे। आजकल तो कबाड़ से कला का फैशन ही चल गया है।

अजित दुबे

मेरे सवाल पर वरिष्ठ कलाकार अजित दुबे ने बहुत ही महत्वपूर्ण बात लिखी। उन्होंने लिखा कि यदि कला के दृष्टिकोण से देखा जाए तो, दुनिया में या पूरे ब्रह्मांड में ऐसा कुछ भी नहीं जो कला से बाहर हो। यह देखने के तरीके पर निर्भर करता है की हम किस प्रकार देख रहे हैं। इसलिए अपने दृष्टिकोण को बदलिए फिर, दुनिया की हर व्यवस्था, हर लय और हर अराजकता में भी एक छुपा हुआ पैटर्न मिलेगा। कला इसी पैटर्न को देखने और महसूस करने की दृष्टि है। जब कलाकार इस स्तर पर देखने लगता है, तो उसके लिए जड़ और चेतन का भेद मिट जाता है। फिर कलाकार के लिए सब कुछ अर्थात कुछ भी कला बन जाता है।

भीम सिंह बेरवाल

भीम सिंह बेरवाल लिखते हैं कि फूहड़ता और नकारात्मकता कला नही है पर अभिनय के द्वारा इसे अभिव्यक्त करना कला है। बेरवाल जी ने सही कही है कि अभिव्यक्त करना कला है। हालाँकि उन्होंने बात अभिनय के संदर्भ में कही पर देखें तो यह बात चित्रकला और दूसरी ललित कलाओं पर भी लागू होती है। न्यूड पेंटिंग और स्कल्पचर से लेकर विरूपण तक में कला वस्तुतः अभिव्यक्ति में है, पदार्थ में नहीं। दृश्य नहीं, चेतना कला है।  

रूप चंद

कलाकार रूप चंद इस सवाल को को अलग तरह से देखते हैं। वह लिखते हैं कि दुनिया में कला नहीं, कला को देखने वाली दृष्टि दुर्लभ है। जब दृष्टि जागती है, तब हर अनुभव, हर समस्या और हर अवसर कला बन जाता है। उनकी बात सही है। अभी कुछ दिन पहले कवि और चित्रकार कुमार अनुपम से चर्चा हो रही थी, कला को देखने को लेकर। उनका कहना था कि कला को कैसे देखा जाए, यह एक बड़ी समस्या है, विशेषरूप से अमूर्त कला को देखना लोगों के लिए एक समस्या है। तब मैंने सवाल उठाया था कि कला को कैसे देखना एक समस्या जरूर है पर उससे बड़ी समस्या यह है कि लोगों में कला को देखने की संस्कार ही नहीं है।

पिछले दिनों कुछ प्रदर्शनियों के दौरान एक दुखद अनुभव यह रहा कि सार्वजनिक गैलरी से लेकर निजी गैलरी तक में, लोगों की भीड़ तो थी पर उस भीड़ में कला देखने वाले लोग गिनती के थे। लोग कलाकृतियाँ देखने या उद्घाटन करने आये अतिथियों को सुनने की बजाय आपसी बातचीत में इतने व्यस्त थे कि उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं था कि उनके जोर-जोर से बोलने से दूसरे लोगों को परेशानी हो सकती है। कला को देखने को लेकर यह एक बड़ी समस्या है। गैलरियों में लोग होते हैं, पर देखने वाले नहीं। और, आश्चर्य नहीं कि ऐसा करने वाले ज्यादातर लोग कलाकार होते हैं। कलाकारों तक में कला को देखने की कमी है। इसीलिए उन्हें सबकुछ में कला दिखाई नहीं देती है।

बहरहाल, यह एक लंबी चर्चा का विषय है, पर मेरा मानना है कि इस तरह की चर्चा होती रहनी चाहिए, भले ही उसका कोई अंतिम निष्कर्ष न निकले। कला वैसे भी अंतिम निष्कर्ष नहीं देती, वह संभावनाओं के दरवाजे खोलती है। फिलहाल इतना ही, आगे फिर कभी इस पर विचार किया जाएगा।  

One response to “वह क्या है जो कला नहीं है?”

  1. आपने कई कलाकारों के जवाब यहां प्रस्तुत किए हैं ,मुझे भीम सिंह जी के विचारो में परिपक्वता दिखाई दी और आपने भी उसे बहुत ही अच्छे से व्याख्यान किया।👇

    ** भीम सिंह बेरवाल लिखते हैं कि फूहड़ता और नकारात्मकता कला नही है पर अभिनय के द्वारा इसे अभिव्यक्त करना कला है। बेरवाल जी ने सही कही है कि अभिव्यक्त करना कला है। हालाँकि उन्होंने बात अभिनय के संदर्भ में कही पर देखें तो यह बात चित्रकला और दूसरी ललित कलाओं पर भी लागू होती है। न्यूड पेंटिंग और स्कल्पचर से लेकर विरूपण तक में कला वस्तुतः अभिव्यक्ति में है, पदार्थ में नहीं। दृश्य नहीं, चेतना कला है**

    बहुत अच्छा लगा आज कला के ऊपर डिस्कस करने की एक शुरुआत दिखाई दी, ये विवेचना सभी के साक्षात दर्शन द्वारा ही ठीक से की जा सकती है।
    कला पर हम जब कुछ बोलते हैं या अपने विचार व्यक्त करते हैं तो वह विचार तार्किक भी होना चाहिए, जैसे भीम सिंह जी ने दिया और वेद प्रकाश जी ने उसे ठीक से समझाया।

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