Painting-Sculptures, poetry- theater-dance-music all art from India and the world. Art review, art-news, exhibition report, interview.

राजेंद्र धवन : मौन रंगों और रहस्यपूर्ण अमूर्तन के साधक

डॉ वेद प्रकाश भारद्वाज

राजेंद्र कुमार धवन (1936–31 अक्टूबर 2012), जिन्हें कला-जगत में प्रायः राजेंद्र धवन के नाम से जाना जाता है, भारतीय आधुनिक कला के उन विशिष्ट अमूर्त चित्रकारों में थे जिन्होंने रंग, रूप और संवेदना की ऐसी चित्र-भाषा विकसित की, जो किसी दृश्यात्मक चमत्कार या नाटकीय प्रभाव के बजाय मौन, ध्यान और आत्मानुभूति की ओर ले जाती है। नई दिल्ली में जन्मे धवन ने 1953 से 1958 के बीच दिल्ली पॉलिटेक्निक (वर्तमान कॉलेज ऑफ आर्ट, नई दिल्ली) में कला की शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद 1960 से 1962 तक उन्होंने तत्कालीन यूगोस्लाविया के बेलग्रेड इंस्टीट्यूट ऑफ आर्ट में अध्ययन किया। अपने समकालीन कलाकारों के साथ उन्होंने द अननोन‘ (The Unknown) नामक कलाकार समूह की स्थापना की, जिसने 1960 के दशक के आरंभ में भारतीय आधुनिक कला में नए प्रयोगों को प्रोत्साहित किया। 1970 के बाद वे पेरिस में बस गए, जहाँ उन्होंने अपने जीवन और सृजन का अधिकांश समय बिताया।

राजेंद्र धवन उन विरल भारतीय अमूर्त चित्रकारों में थे जिन्होंने कैनवास पर चटख और चमकीले रंगों का प्रयोग लगभग कभी नहीं किया। उनकी चित्रकृतियों में पृथ्वी के स्वाभाविक रंग—हल्का और गहरा भूरा, धूसर, मद्धिम नीला तथा हरा—प्रमुखता से दिखाई देते हैं। इन रंगों की संयमित उपस्थिति उनकी रचनाओं को रहस्यमय, ध्यानमय और आत्मीय बनाती है। रंगों के बीच कोई तीखा विरोध नहीं होता; वे एक-दूसरे में धीरे-धीरे विलीन होते हुए एक शांत दृश्य-संवाद रचते हैं। परिणामस्वरूप दर्शक किसी दृश्य का नहीं, बल्कि एक गहन अनुभूति का अनुभव करता है।

अमूर्त कला में न्यूनतावादी दृष्टिकोण अपनाते हुए धवन ने कैनवास के आकार को अभिव्यक्ति का निर्णायक तत्व नहीं बनने दिया। उनके लिए चित्र का प्रभाव उसके आयामों से अधिक उसकी आंतरिक संरचना, रंग-संतुलन और संवेदनात्मक ऊर्जा पर निर्भर था। वे नाटकीय संरचनाओं या दृश्यात्मक चमत्कारों के बजाय रंगों के सूक्ष्म संबंधों, सतह की बनावट और प्रकाश की महीन अनुभूतियों पर भरोसा करते थे।

उनकी चित्रकृतियाँ दर्शक के सामने किसी निश्चित अर्थ का उद्घाटन नहीं करतीं, बल्कि अनेक संभावनाओं के द्वार खोलती हैं। कभी उनमें किसी भू-दृश्य का आभास मिलता है, कभी किसी स्थापत्य संरचना की धुंधली उपस्थिति, तो कभी वे आकाश में बनते-बिगड़ते बादलों की आकृतियों का भ्रम उत्पन्न करती हैं। वास्तव में राजेंद्र धवन की कला इसी सृजनात्मक अनिश्चितता पर आधारित है। यह अनिश्चितता दर्शक को अपनी कल्पना, स्मृतियों और जीवनानुभवों के सहारे चित्र के साथ एक निजी संवाद स्थापित करने के लिए प्रेरित करती है।

धवन स्वयं किसी निश्चित विचारधारा या प्रतीकवाद के आग्रह से दूर रहे। उनके लिए चित्रकला अनुभव की ऐसी प्रक्रिया थी जिसमें कलाकार अपने जीवन के संचित बोध को रंगों, सतहों और प्रकाश के माध्यम से व्यक्त करता है। उनकी रचनाएँ किसी कथा का वर्णन नहीं करतीं, बल्कि ऐसी मानसिक अवस्था निर्मित करती हैं जिसमें दर्शक स्वयं अपने अनुभवों के साथ चित्र के भीतर प्रवेश करता है। शायद इसी कारण उनकी पेंटिंग्स को शब्दों में बाँधना कठिन माना जाता है; उन्हें समझने से अधिक महसूस किया जाता है।

भारत और यूरोप में उनकी अनेक एकल एवं सामूहिक प्रदर्शनियाँ आयोजित हुईं। उनकी कृतियाँ नई दिल्ली की नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट, ललित कला अकादमी, भोपाल के भारत भवन संग्रहालय तथा पेरिस की नेशनल फाउंडेशन ऑफ कंटेम्पररी आर्ट सहित अनेक प्रतिष्ठित सार्वजनिक और निजी संग्रहों में सुरक्षित हैं। समकालीन भारतीय अमूर्त चित्रकारों में उनका स्थान इसलिए विशिष्ट है कि उन्होंने कभी लोकप्रियता या कला-बाज़ार की अपेक्षाओं के अनुरूप अपनी शैली नहीं बदली। वे अपने चित्र-संसार के प्रति आजीवन प्रतिबद्ध रहे।

भारतीय आधुनिक अमूर्त कला के इतिहास में राजेंद्र धवन का स्थान इसलिए भी अलग दिखाई देता है कि उन्होंने अपने समय के प्रमुख कलाकारों से भिन्न मार्ग चुना। यदि वी. एस. गायतोंडे की चित्रकला अपनी गहन निस्तब्धता और ध्यानमय वातावरण के लिए जानी जाती है, एस. एच. रज़ा भारतीय दार्शनिक चिंतन, प्रकृति और ‘बिंदु’ जैसे प्रतीकों के माध्यम से अपनी विशिष्ट पहचान निर्मित करते हैं, और जे. स्वामीनाथन लोक तथा जनजातीय संवेदनाओं को आधुनिक संदर्भों में रूपायित करते हैं, तो राजेंद्र धवन की कला किसी निश्चित प्रतीक, दार्शनिक अवधारणा या सांस्कृतिक संकेत पर निर्भर नहीं दिखाई देती। गायतोंड़े की चित्रकला में ऐसे रूपाकार और संकेत अवश्य मिलते हैं जिनकी तुलना कभी-कभी तांत्रिक अथवा पूर्वी आध्यात्मिक परंपराओं से की जाती है, किंतु उनकी कला किसी निश्चित प्रतीक-व्यवस्था का प्रत्यक्ष अनुसरण नहीं करती। इसके विपरीत धवन की चित्रकला दृश्य संसार की क्षणभंगुर अनुभूतियों, प्रकाश और छाया के सूक्ष्म खेल, मद्धिम रंग-लय तथा सतह की संवेदनात्मक संरचना पर आधारित है। वे दर्शक पर कोई निश्चित अर्थ आरोपित नहीं करते, बल्कि उसे चित्र के साथ अपना अर्थ गढ़ने की स्वतंत्रता देते हैं। इसीलिए उनकी कृतियाँ पहली दृष्टि में जितनी शांत और संयत प्रतीत होती हैं, उतनी ही देर तक देखने पर नए-नए अर्थों और अनुभूतियों की परतें खोलती चली जाती हैं।

राजेंद्र धवन की चित्रकला की एक और उल्लेखनीय विशेषता यह है कि उसमें यूरोपीय आधुनिकतावाद की औपचारिक उपलब्धियों का प्रभाव दिखाई देता है, किंतु उसकी संवेदना भारतीय अनुभव-जगत से जुड़ी प्रतीत होती है। उनकी कला में ऐसे प्रत्यक्ष प्रतीक नहीं मिलते जिन्हें भारतीय दर्शन या संस्कृति से सीधे जोड़ा जा सके, फिर भी उसकी अंतर्धारा में ‘निराकार’ और ‘शून्य’ जैसे भारतीय दार्शनिक बोध की सूक्ष्म प्रतिध्वनि अनुभव की जा सकती है। उन्होंने पश्चिमी अमूर्त कला की उपलब्धियों को आत्मसात अवश्य किया, पर उनका अनुकरण नहीं किया। रंगों की मितव्ययिता, रिक्त स्थानों की अर्थपूर्ण उपस्थिति और सतह की जीवंत बनावट के माध्यम से उन्होंने ऐसी स्वतंत्र चित्र-भाषा विकसित की, जो न पूरी तरह पश्चिमी अमूर्तन की प्रतिध्वनि है और न भारतीय परंपरा का प्रत्यक्ष विस्तार।

31 अक्टूबर 2012 को पेरिस में उनका निधन हुआ, किंतु उनकी चित्रकला आज भी भारतीय आधुनिक कला की सबसे सूक्ष्म, संयमित और ध्यानमय अभिव्यक्तियों में गिनी जाती है। राजेंद्र धवन ने भारतीय आधुनिक अमूर्त चित्रकला को ऐसी दृश्य-भाषा प्रदान की, जिसमें रंगों की मितव्ययिता, सतह की सूक्ष्म संरचना और मौन की गहन उपस्थिति समान रूप से सक्रिय हैं। उन्होंने न तो किसी स्थापित शैली का अनुकरण किया और न ही दर्शक पर किसी निश्चित अर्थ का आग्रह किया। उनकी कला देखने की नहीं, अनुभव करने की कला है—जहाँ चित्र किसी कथा का अंत नहीं, बल्कि संवेदना की एक नई यात्रा का आरंभ बन जाता है। यही कारण है कि भारतीय आधुनिक कला के इतिहास में राजेंद्र धवन का योगदान एक स्वतंत्र, मौलिक और दीर्घजीवी उपस्थिति के रूप में सदैव स्मरण किया जाएगा।

नोटः सभी फोटो गूगल से साभार। चित्रों का इस्तेमाल केवल संदर्भ के लिए है, इनके उपयोग का कोई व्यावसायिक उद्देश्य नहीं है।

One response to “राजेंद्र धवन : मौन रंगों और रहस्यपूर्ण अमूर्तन के साधक”

  1. Ashok bhandari Avatar
    Ashok bhandari

    बहुत ही सटीक लेख, वेद जी शेयर करने के लिए धन्यवाद

Leave a Reply

Discover more from Art News India

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading