विमला आर्ट फोरम, गुरुग्राम में कला गुरु के जन्मदिवस पर विशेष कार्यक्रम का आयोजन

विमला आर्ट फोरम गुरुग्राम में 25 जुलाई 2026 को कला गुरु बीरेश्वर भट्टाचार्य के 92वें जन्मदिवस पर एक संवाद का आयोजन किया गया। किसी कलाकार की स्मृति में उसके विद्यार्थियों की उपस्थिति में इस तरह का आयोजन होना, कला के लिए आवश्यक है। कार्यक्रम के मुख्य केंद्र सुमन कुमार सिंह बीरेश्वर जी के विद्यार्थी रहे हैं। इस अवसर पर वरिष्ठ कलाकार व कला लेखक अशोक भौमिक मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित थे। इस अवसर पर विमला आर्ट फोरम की ट्रस्टी कलाकार कंचन मेहरा, फोरम के प्रेसिडेंट कलाकार दिलीप शर्मा, शैलजा आर्ट गैलरी की निदेशक शैलजा जैन, सुधीर जैन, बीरेश्वर जी के शिष्य रहे फोटोग्राफर पीके डे, कलाकार त्रिभुवन देव, रागिनी सिन्हा, मैत्रेयी कुमार, बिपिन कुमार, सुनील कुमार, शिखा सिन्हा, रवि रंजन, जय त्रिपाठी, सुधांशु सुतार, उमेश प्रसाद, राजेंद्र प्रसाद सिंह, संजु दास, रीना, प्रियंका सिन्हा व अन्य लोग उपस्थित थे।

कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए सुमन कुमार सिंह ने कहा कि बीरेश्वर भट्टाचार्य केवल एक शिक्षक नहीं थे, वह वास्तविक अर्थ में कला गुरु थे। एक ऐसे गुरु जो जीवन भर अपने विद्यार्थियों को आगे बढ़ाने का प्रयास और उनका मार्गदर्शन करते रहे। एक कलाकार के रूप में उन्होंने कभी खुद के बारे में नहीं सोचा। उन्होंने कभी अपनी एकल प्रदर्शनी में रुचि नहीं ली परंतु अपने विद्यार्थियों को ललित कला अकादेमी की वार्षिक प्रदर्शनी सहित अन्य प्रदर्शनियों में भागीदारी के लिए मार्गदर्शन करते रहे। वह जब ललित कला अकादेमी की कलाकार परिषद के सदस्य बने तब उन्होंने अनेक विद्यार्थियों को प्रोत्साहित किया। पटना कला महाविद्यालय से सेवा मुक्त होने के बाद भी उनका अपने विद्यार्थियों से संपर्क बना रहा। उन्हें इस बात पर गर्व होता था कि बिहार के कलाकारों ने देश-विदेश में अपना मुकाम बनाया है। वह खुद अपने विद्यार्थियों के साथ विभिन्न जगहों पर जाकर पेंटिंग किया करते थे। तकनीकी कारणों से वह पटना कला महाविद्यालय के प्राचार्य नहीं बन सके पर बिहार से बाहर ज्यादातर लोग उन्हें प्राचार्य ही मानते थे। बिहार के कला इतिहास की बात करें तो उनके जैसा काम किसी ने नहीं किया। वह जीवन के अंतिम दिनों तक काम करते रहे। घुटनों की समस्या हो जाने के कारण वह पेंटिंग नहीं कर पाते थे पर अपने सिरहाने हमेशा स्केचबुक रखते थे जिसमें वह कुछ न कुछ बनाते रहते थे।

बीरेश्वर भट्टाचार्य एक कलाकार के साथ ही कला लेखक भी थे। हालांकि उन्होंने कला पर लगातार लेखन नहीं किया पर उन दिनों बिहार के कलाकारों की प्रदर्शनी के कैटलॉग वही लिखा करते थे। उनका एक महत्वपूर्ण योगदान रहा बिहार के कलाकारों और कला गतिविधियों को देश के अन्य हिस्सों तक पहुंचाना। यह बात है 1974 की जब उन्होंने महसूस किया कि बिहार की कला गतिविधियों को देश के अन्य हिस्सों में पहुंचाने का कोई साधन नहीं है। उन दिनों आज जैसी सुविधाएँ नहीं थीं। तब उन्होंने तीन लोगों का एक ट्राइंगल ग्रुप बनाया जिसमें उनके साथ श्याम शर्मा और रंजीत सिन्हा थे। उस समय उन्होंने पटना में सड़कों पर कला प्रदर्शन की शुरुआत की। उस समय उन्होंने एक साल तक अंतरदेशी पत्र पर एक पत्रिका निकाली जिसमें एक लेख, कला गतिविधियों की खबरें कविताएँ, रेखांकन आदि होते थे, और साथ में श्याम शर्मा व रंजीत सिन्हा के प्रिंट होते थे।

इस अवसर पर बीरेश्वर भट्टाचार्य से संपर्क में रहे कलाकार सुधांशु सुतार ने अपने संस्मरण सुनाते हुए कहा कि उनसे मिलना हमेशा परिवार के किसी वरिष्ठ से मिलने के समान था। बीरेश्वर दा हमेशा कलाकारों को प्रोत्साहित करते थे। ललित कला अकादेमी के गेस्ट हाउस में वह युवा कलाकारों के काम को देखते और सराहना करते थे। सुधाशुं जी ने बताया कि अपनी कला पर लिखने के लिए बीरेश्वर दा ने ही प्रोत्साहित किया। इस अवसर पर बीरेश्वर जी के अंतिम विद्यार्थियों में रहे फोटोग्राफी कलाकार पीके डे ने अपने संस्मरण सुनाये। कार्यक्रम में त्रिभुवन देव, जय त्रिपाठी, बिपिन कुमार, मैत्रेयी कुमार, रवींद्र कुमार दास, रीना आदि ने भी बीरेश्वर जी के साथ अपने अनुभवों को साझा किया।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता अशोक भौमिक ने इस अवसर पर कला को अर्थ और कथा से बांधने की परिपाटी का जिक्र करते हुए कला की मुक्ति की अवधारणा को सामने रखा। उन्होंने कहा कि कोई कलाकार नंगे पांव चलता है, या उसने लंबी दाढ़ी बढ़ा ली है तो उसका रचना से कोई संबंध नहीं है। आजादी के बात ऐसा वातावरण बना है जिसमें कला से अधिक कलाकार का महत्व हो गया है। हम सब आज एक नकली दुनिया में जीते हैं जिसमें प्रत्येक कलाकार यह साबित करने की कोशिश में रहता है कि वह दूसरों से बेहतर कलाकार है। आज कलाकार को ललित कला अकादेमी या किसी और संस्था का पुरस्कार चाहिए, आर्टिस्ट कैंप चाहिए, कुल मिलाकर आज कलाकार को एक स्वीकृति की जरूरत पड़ रही है। इसलिए कलाकार अपने बायोडाटा में लिखते हैं कि उसने इतने कैंप किए हैं, उसे इतने पुरस्कार मिले हैं, जबकि इन सबका चित्र के साथ कोई संबंध नहीं है। आजादी के बाद जो कुछ होता रहा है वह सब चित्र रचना के सिद्धांतों से दूर है। इस अवसर पर उन्होंने चित्रकथा और पेंटिंग में अंतर किये जाने को आवश्यक बताया।
कार्यक्रम के अंत में विमला आर्ट फोरम के दिलीप शर्मा ने सभी वक्ताओं और अतिथियों का आभार व्यक्त किया।

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