डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज

क्या कला सिर्फ रूप में ही है, या कला का अस्तित्व रूप से अलग होता है, यह सवाल अक्सर दुविधा उत्पन्न करता है। कला कला के लिए है, जैसे सिद्धांतों ने जिस कला की परिकल्पना को सामने रखा था, उसने लंबे समय तक कलाकारों को कला के रूप तत्व तक सीमित रखा। आज भी बहुत सारे कलाकार यह कहते सुने जा सकते हैं कि किसी पेंटिंग या शिल्प में किसी कहानी या अर्थ की तलाश करना उचित नहीं है। इस बात से सहमत होना थोड़ा मुश्किल है क्योंकि मनुष्य का स्वाभाविक चरित्र है कि वह किसी भी जीव या जड़ तत्व को देखते ही सबसे पहले उसे अनुभव और संज्ञान के अनुरूप एक निश्चित अर्थ में बांधने लगता है। किसी मित्र के मिलने पर जैसे असंख्य बातें और भाव मस्तिष्क में अस्तित्व में आ जाते हैं, वैसा किसी अपरिचित के साथ नहीं होता, अलबत्ता अपरिचित से मुलाकात होने पर कई दूसरे प्रश्न हमारे सामने होते हैं, जो हमें जीवन के अन्य भावों और अर्थों तक ले जाते हैं। इसीलिए कला को कलाकृति के अस्तित्व में खोजने की जगह उस अनास्तित्व में खोजना चाहिए जो रचना में दृश्य रूप में उपस्थित नहीं है, जो संकेतित है, अदृश्य है फिर भी वह है।

कला का प्रश्न केवल रूप का प्रश्न नहीं है; वह अस्तित्व का प्रश्न भी है। पेंटिंग हो, शिल्प हो या किसी भी माध्यम में सृजित कलाकृति—उसका अपना एक भौतिक अस्तित्व होता है। उसमें अंकित मनुष्य, प्रकृति, पशु-पक्षी अथवा अन्य वस्तुओं का भी एक दृश्य अस्तित्व होता है। किंतु क्या इन रूपों की मात्र उपस्थिति ही कला है? यदि ऐसा होता, तो हर चित्र, हर प्रतिकृति और हर वस्तु कला कहलाती। वस्तुतः कला का वास्तविक जन्म वहाँ होता है, जहाँ वह दृश्य के भीतर अदृश्य और अस्तित्व के भीतर अनास्तित्व की खोज आरम्भ करती है, और इस खोज के पूर्ण होने पर हमारे सामने दृश्य रूप से अलग एक नई अर्थ छवि प्रकट होती है।

इसीलिए कला को एक ऐसी खोज के रूप में ही स्वीकार करना चाहिए जो बाह्य रूपों की नहीं, बल्कि उन भावों, अनुभवों और विचारों की होती है जो प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देते, फिर भी कलाकृति की आत्मा बनकर उसमें व्याप्त रहते हैं। कलाकार रेखाओं, रंगों, आकारों और आयतनों का निर्माण करता है, किंतु उसका उद्देश्य केवल रूप का सृजन नहीं होता; वह उन रूपों के माध्यम से उस सत्य को व्यक्त करना चाहता है, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त नहीं किया जा सकता। इस प्रकार कला दृश्य से अदृश्य की, साकार से निराकार की और अस्तित्व से अनास्तित्व की यात्रा बन जाती है। और इस यात्रा की पूर्णता संभव होती है, दृश्य रूप से अलग रचना को उस भाव रूप में ग्रहण करने से जब दर्शक रचना के रूप से अलग उस अर्थ तक पहुंचता है जो कहीं गहरे पैठा होता है।

भारतीय सौंदर्यशास्त्र इस तथ्य को बहुत पहले पहचान चुका था। भरतमुनि के रस-सिद्धांत में कलाकृति का लक्ष्य वस्तु का पुनरुत्पादन नहीं, बल्कि रस की निष्पत्ति है। रस वह अनुभूति है जो दृश्य रूपों से परे जाकर सहृदय के भीतर घटित होती है। इसी प्रकार आनंदवर्धन के ध्वनि-सिद्धांत में कहा गया कि काव्य और कला का सर्वोच्च अर्थ वह नहीं है जो प्रत्यक्ष दिखाई देता है, बल्कि वह है जो संकेतित होता है। अर्थात् कला का सत्य उसके कथित में नहीं, उसके अकथित में निहित है। वही अकथित क्षेत्र अनास्तित्व का क्षेत्र है, जहाँ से अस्तित्व का गहन बोध जन्म लेता है।
अद्वैत वेदांत की दृष्टि से भी यह विचार सार्थक प्रतीत होता है। जो दिखाई देता है, वह अंतिम सत्य नहीं; दृश्य के पीछे एक व्यापक और अखंड सत्ता विद्यमान है। कलाकार जब किसी वृक्ष, मनुष्य या परिदृश्य का चित्र बनाता है, तो उसका उद्देश्य केवल उस वस्तु का रूपांकन नहीं होता। वह उस चेतना, उस मौन और उस रहस्य को स्पर्श करना चाहता है, जो दृश्य के भीतर अदृश्य रूप से विद्यमान है। इसलिए महान कलाकृतियाँ केवल देखी नहीं जातीं, वे अनुभव की जाती हैं।

आज के समय में कला-विमर्श में ‘अवधारणा’ (Concept) शब्द अत्यंत प्रचलित है। अनेक कलाकार रूप की अपेक्षा अवधारणा को अधिक महत्त्व देते हैं, जबकि कुछ कलाकार शुद्ध दृश्य-भाषा की स्वतंत्रता का समर्थन करते हैं। किंतु यदि गहराई से विचार करें, तो दोनों के बीच कोई वास्तविक विरोध नहीं है। रूप स्वयं में कभी निष्प्राण नहीं होता; वह किसी न किसी अनुभूति, विचार या संवेदना का वाहक होता है। यदि किसी कलाकृति में कोई आंतरिक भाव, अनुभव या अवधारणा नहीं है, तो वह केवल कौशल का प्रदर्शन रह जाती है, कला नहीं बन पाती।
अतः यह कहना अधिक समीचीन होगा कि कला अस्तित्व का पुनरुत्पादन नहीं करती, बल्कि अस्तित्व के उन आयामों को उद्घाटित करती है जो सामान्य दृष्टि से ओझल रहते हैं। वह हमें यह अनुभव कराती है कि जो अनुपस्थित प्रतीत होता है, वही अनेक बार सबसे अधिक उपस्थित होता है। मौन शब्दों से अधिक बोलता है, रिक्तता रूपों से अधिक अर्थवती हो सकती है, और अनास्तित्व ही अस्तित्व की सबसे गहन संभावना बन जाता है।
इसी अर्थ में कला अनास्तित्व में अस्तित्व की खोज है। वह दृश्य संसार के पार स्थित उस अनुभव का आमंत्रण है, जहाँ वस्तुएँ अपने नाम और रूप से मुक्त होकर केवल अनुभूति बन जाती हैं। कलाकार की सृजन-प्रक्रिया और सहृदय की आस्वादन-प्रक्रिया, दोनों इसी खोज की दो अवस्थाएँ हैं। एक रचता है, दूसरा उस रचना में स्वयं को खोजता है। और शायद यहीं कला अपनी सर्वोच्च सार्थकता प्राप्त करती है—वह हमें संसार को देखने की नहीं, उसे नए ढंग से होने की दृष्टि प्रदान करती है।

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