कला कथा

अनुपस्थित का दायरा

अमूर्त कला पर एक विचार

डॉ वेद प्रकाश भारद्वाज

अमूर्त कला को लेकर विद्वानों ने कई तरह के विचार व्यक्त किये हैं। अमूर्त कला को नॉन आब्जेक्टिव आर्ट कहा गया. उसे विषय-निरपेक्ष कला कहा गया, संदर्भहीन कला कहा गया। हेरॉल्ड रोशेनबर्ग ने जैक्सन पोलाक का संदर्भ देते हुए उसे एक्शन पेंटिंग कहा यानी ऐसी कला जिसमें सिर्फ क्रिया महत्वपूर्ण है, क्रिया का परिणाम नहीं। उनके समकालीन रहे क्लेमेंट ग्रीनबर्ग भी जैक्सन पोलॉक के प्रशंसक थे पर वह रुपवाद की अवधारणा पर अत्यधिक आश्रित थे। वह शुद्धता के साथ ही माध्यम की स्वायत्तता की बात करते थे। अभिव्यक्तिवादी अमूर्त कला का उन्होंने समर्थन किया। अमूर्त कला पर पश्चिम में अनेक विद्वानों ने विचार मंथन किया पर कोई भी एक ऐसा सिद्धांत प्रस्तुत नहीं कर सका जो सर्वमान्य हो। और यही कला का अमूर्त हो जाना है। अमूर्त कला जो सर्वमान्य होने को खारिज करती है। सर्वमान्य यानी जिसके अस्तित्व पर सब सहमत हों। सबका सहमत होना यानी उसका कोई एक निश्चित अर्थ निर्धारित किया जा सकना। एक निश्चित अर्थ का निर्धारण मूर्त कला की शक्ति भी थी, और उसकी सीमा भी, जो कलाकारों को भी एक दायरे में कैद रखती थ। इस दायरे को तोड़ने के लिए ही सबसे पहले मानवीय संसार से कला को मुक्त किया गया और उसके बाद उसे किसी भी तरह के परिचित संसार से मुक्त कर दिया गया। कलाकारों ने कला को, विशेषरूप से चित्रकला को अनुपस्थिति का दायरा बना दिया, यानी जहां कुछ भी उपस्थित नहीं है, हालांकि सब कुछ करने के बाद भी कलाकार इस अनुपस्थिति में भी उपस्थिति की संभावना को पूरी तरह मिटा नहीं पाये।

“अनुपस्थिति का दायरा” अमूर्त चित्रकला पर हमें नये सिरे से विचार का अवसर दे सकता है। हालांकि यहां एक सवाल अवश्य उठना चाहिए कि हम किसकी अनुपस्थिति की बात कर रहे हैं। और यह भी कि यदि अमूर्त कला में हम अनुपस्थिति को देख रहे हैं तो यह तो तय है कि वह किसी न किसी रूप में अपना संबंध उपस्थित संसार से बनाये हुए है अवश्य। बहरहाल, यदि हम यह मान लें कि किसी पेंटिंग में जो कुछ भी चित्रित है, उसमें कोई ऐसा तत्व नहीं है जिसे हम सांसारिक यथार्थ की उपस्थिति से जोड़ सकें तो वह अमूर्तन में बदल जाएगी। इस तरह अमूर्त कला किसी भी तरह की स्पष्ट पहचानी जा सकने वाली उपस्थिति को नकारती है। पर इस नकार के बाद भी उसकी अपनी उपस्थिति एक ऐसी स्थिति उत्पन्न कर देती है जो उसके अनुपस्थिति के आधार को भी संदिग्ध बना देती है। किसी भी तरह अमूर्त कला एकरेखीय परिभाषा वाली कला नहीं बन पाती है। वह हमेशा, व्यक्ति सापेक्षता के सिद्धांत के अनुरुप अपना अर्थ बदलती रहती है। कलाकार और दर्शक दो ध्रूवों के बीच वह कई बार अपनी ही उपस्थिति को नकारती दिखाई देती है, और अर्थांतर के क्षेत्र में प्रवेश करते हुए अक्सर अनुपस्थित हो जाती है, इतनी अधिक अनुपस्थित की लोग उसके कला होने पर ही संदेह करने लगते हैं। यह स्थिति अमूर्त कला की स्वतंत्रता है और पराधीनता भी। उसका किसी भी रूप और अर्थ से स्वतंत्र होना, अत्यधिक खुलापन अंततः उसके होने को ही संदिग्ध बना देता है।  

रोशेनबर्ग ने जब कहा कि कला रुप में नहीं उस क्रिया में है जो की गई है। जैक्सन पोलॉक का संदर्भ देते हुए उन्होंने जो कहा था उसका अर्थ यही था कि पेंटिंग एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें कलाकार अपना जीवन जीता है, जिसमें वह अपनी समस्त इंद्रियों के साथ क्रिया करता है। उन्होंने ग्रीनबर्ग की तरह अमूर्त कला के संदर्भ में सतह, रंग आदि के आयाम को अनदेखा करते हुए कहा कि क्रिया ही कला है। दूसरे शब्दों में कला का अर्थ है होना, जो हुआ है वह कला है। इस तरह से देखें तो रचना के शुरु होने और अंत के बीच की क्रिया ही वास्तविक कला है। पर यह विचार बहुत जंचता नहीं है क्योंकि क्रिया की भूमिका तो मूर्त कला में भी है। इसलिए इस बात को प्रशंसा मिलने के बाद भी सर्वसम्मत सिद्धांत के रूप में मान्यता नहीं मिल पाई। वैसे रोशेनबर्ग की बात को याद करते हुए यह विचार मन में आता है कि यदि कला रचना के शुरु और अंत के बीच की क्रिया है तो फिर रचना के अंत के साथ ही कला का भी अंत मान लिया जाना चाहिए, पर ऐसा होता नहीं है।  

अमूर्त होना मूर्त को नकारना नहीं है, बल्कि उन स्पष्ट चिह्नों को नकारना है जो कला को एक अर्थ  तक सीमित कर देते हैं, और दर्शकों की स्वतंत्रता को असंभव बना देते हैं। तो फिर अमूर्त क्या है, इस प्रश्न के साथ ही एक विचार मन में आता है कि वह मूर्त संसार की भावात्मक उपस्थिति का क्षेत्र है जिसे किसी एक रूप में या आकार में बांधा नहीं जा सकता। जीवन में बहुत कुछ ऐसा होता है जो दिखाई नहीं देता, पर वह होता है, जैसे प्रेम, मित्रता, और ऐसी ही दूसरी भावनाएं जो जीवन में होती हैं, किसी न किसी रूप में हम उन्हें देखने का दावा करते हैं, परंतु भावनाओं का कोई रूप नहीं होता। हम सिर्फ उन भावनाओं को किसी प्रतीकात्मक आकार के माध्यम से व्यक्त करते हैं। पर इन अरूप भावनाओं के साथ ही कई बार जो कुछ हमें दिखाई देता है, उसके दृश्य रूप से अलग हमारा विचार उसके बारे में हो सकता है। उसके साथ कई तरह की कल्पनाएँ, कई तरह के भाव जागृत होते हैं। इन कल्पनाओं और भावनाओं को किसी ठोस आकार में बांधा नहीं जा सकता। एक आकृतिमूलक कलाकार इन्हें किसी रूप या आकार का सहारा लेकर अभिव्यक्त करता जरुर है क्योंकि वह रुप के बाहर देख और सोच नहीं पाता है। इसके विपरीत एक अमूर्त कलाकार इन्हें सांकेतिक रूप में रंगों के संयोजन, या ऐसी संरचनाओं के माध्यम से व्यक्त करता है जिनका कोई एक स्थिर रूप नहीं होता, और इसीलिए उनका कोई एक निश्चित अर्थ भी नहीं होता। जैसे ही किसी रचना में अर्थ की स्थिरता कायम हो जाती है, अमूर्तन समाप्त हो जाता है। इसीलिए अमूर्त कला में अर्थ हमेशा संदर्भ के अनुसार बदलता रहता है। उदाहरण के लिए हम रेखा को लें तो उसका कोई एक निश्चित रूप या आकार नहीं है। मनुष्य का एक रूप है, पेड़, पहाड़, ज्यामितीय आकार, इन सबका एक निश्चित रूप है, निश्चित संरचना है। इन निश्चित आकारों में कलाकारों ने विखंडन या विरूपण के माध्यम से उन्हें अलग तरह से प्रस्तुत करने का काम अवश्य किया, पर वहां मूल आकार व रूप की अनिवार्य प्रतीति उस रचना को सीमित कर देती है। इसके विपरीत अमूर्त रचनाएं वह संदर्भ के अनुसार अर्थ देती है। कैनवास पर यदि सिर्फ रंग है तो उसका अर्थ भी संदर्भ के अनुरुप बदल जाता है। अर्थ का यह बदलाव दर्शक की अपनी चेतना पर भी निर्भर करता है। वह उन्हें किसी व्यक्ति की, प्रकृति के किसी विशेष पक्ष की, किसी भावना की अभिव्यक्ति के संदर्भ में ग्रहण कर सकता है। चित्र में कोई निश्चित रूप या आकार नहीं होना वास्तव में उपस्थित की अनुपस्थिति का परिचय देता है। जो अनुपस्थित है, वह दृश्य में भले ही न हो, पर वह है या था इससे इनकार नहीं किया जा सकता। इसीलिए अमूर्त चित्रण वस्तुतः अनुपस्थित का दायरा है जिसमें उपस्थित का आधार शामिल है।

समाज, राजनीति, धर्म जैसी व्यवस्थाएँ वस्तुतः मनुष्य आधारित व्यवस्थाएँ हैं पर वास्तविक अर्थ में देखें तो वह अमूर्त हैं, क्योंकि उनका कोई एक स्थिर रूप नहीं है। इसीलिए उनमें मनुष्य की उपस्थिति भी अनुपस्थिति के समान होती है। इसी प्रकार जब कोई कलाकार मनुष्य की उपस्थिति की जगह उसके होने की प्रमाणिकता को दिखाना चाहता है तो अमूर्तन का सहारा लेता है। इस प्रकार अमूर्त कला अनुपस्थिति का दायरा बन जाती है जिसमें हमें एक तरह का शून्य या खालीपन दिखाई देता है। इस खालीपन में हमें रंग के अलावा कई दूसरे अपरिचित चिह्न दिखाई देते हैं, या उनकी उपस्थिति का आभास होता है।

यह खालीपन इस समझ को चुनौती देता है कि जीवन को सिर्फ मानवीय आकार या दूसरे निश्चित पहचान वाले रुपों के माध्यम से ही समझा जा सकता है। वास्तव में देखें तो इंसानी आकृतियों या पहचाने जा सकने वाले रूपों की गैर-मौजूदगी में भी, अमूर्त कला इंसानी मौजूदगी से भरी होती है— भावनात्मक, संवेदनात्मक, मनोवैज्ञानिक अस्तित्व के साथ। इस नजरिये से देखें तो अमूर्त कला दृश्य जगत को रूप की जगह अनुभव के स्तर पर, उसकी अनुपस्थिति से दर्ज करती है। अमूर्त कला किसी भी तरह की रिक्तता या खालीपन का निषेध भी करती है। वह इस विचार को खारिज करती है कि जो दिख रहा है सिर्फ वही सत्य जगत है। इस तरह से अमूर्त कला चाक्षुष जगत को ही सर्वस्व और प्रमाणिक मानने का विरोध करती हुई सीधे-सीधे देखने के अनुभव को खारिज करती है। वह अपने अंदर इस संभावना को लेकर सामने आती है कि जो दिख नहीं रहा है, उसके होने से इनकार नहीं किया जा सकता, बल्कि उसका होना उसकी अनुपस्थिति से अधिक प्रमाणिक हो जाता है। भारतीय दर्शन में जगत को मिथ्या कहा गया है। यह माना गया है कि जो कुछ हमें दिखाई दे रहा है, वह एक भ्रम है, और जो दिखाई नहीं दे रहा है, वह सत्य है। इस तरह दृश्यमान जगत का निषेध करते हुए अमूर्त कला हमें उस सत्य तक ले जाने का प्रयास भी कही जा सकती है। इस तरह उसमें अनुपस्थित का दायरा अधिक सशक्त और अर्थपूर्ण प्रतीत होता है।

इस हिस्से के मूल में गैर-मौजूदगी का विरोधाभास है: यह विचार कि जो खाली दिखता है, वह असल में भरा हुआ है। लेखक का सुझाव है कि एब्स्ट्रैक्ट पेंटिंग “गैर-मौजूदगी का दायरा” इसलिए नहीं बनती क्योंकि उसमें दिखाने की कमी होती है, बल्कि इसलिए कि वह साफ़ तौर पर दिखाने का विरोध करती है। इस जगह में जहाँ “हम इंसानी मौजूदगी को देख नहीं सकते लेकिन हम उसे महसूस कर सकते हैं,” इंसान एक अनदेखी ताकत बन जाता है। यह देखने वाले का ध्यान असल इमेजरी से हटाकर माहौल की गूंज की ओर ले जाता है। कलाकार के निशान—रंग, ब्रश स्ट्रोक, लाइनें—अस्तित्व के निशान के तौर पर काम करते हैं। वे हाथों की हरकत, सांस लेने की लय, भावनाओं के वज़न को दिखाते हैं। इस तरह, पेंटिंग मौजूदगी का बचा हुआ हिस्सा है, जीते हुए अनुभव की एक खामोश छाप है।

इसके अलावा, यह हिस्सा इस बात पर ज़ोर देता है कि खालीपन खुद कभी भी सच में खाली नहीं होता। यह समझ कला की फेनोमेनोलॉजिकल थ्योरीज़ से मेल खाती है, जो कहती हैं कि देखने वाले हमेशा याद, भावना और मतलब को ऐसे रूपों पर प्रोजेक्ट करते हैं जो परिभाषा का विरोध करते हैं। टेक्स्ट बताता है कि एब्स्ट्रैक्ट पेंटिंग में खालीपन कोई इनकार नहीं बल्कि एक बुलावा है—एक ऐसी जगह जहाँ देखने वाले की अपनी चेतना पहचानी जा सकने वाली इमेजरी से बचे गैप को भर देती है। यह विश्वास कि “जो इंसान मौजूद था, वह अभी-अभी कहीं चला गया है” किसी के जाने से अभी भी गर्म कमरे में घुसने का एहसास कराता है। यहाँ गैर-मौजूदगी एक कुछ समय की बात बन जाती है: खालीपन के बजाय एक गूंज।

यह हिस्सा एब्स्ट्रैक्ट में छिपे इमोशनल पहलू की ओर भी ध्यान खींचता है। “सांस, सपने, दिल की धड़कन” के बचे हुए हिस्से इंसान के छोटे, अक्सर नज़र न आने वाले बचे हुए हिस्सों को सिंबॉलिक रूप से बताते हैं। ये एलिमेंट एब्स्ट्रैक्ट पेंटिंग को टेक्निकल एग्ज़िक्यूशन से आगे ले जाते हैं और इसे एक जीते-जागते इंसानी माहौल में रखते हैं। आर्टवर्क उस चीज़ से सामना बन जाता है जिसे देखा नहीं जा सकता लेकिन महसूस किया जा सकता है। इस तरह, “गायब होने का दायरा” इंसानी हालत को ही दिखाता है—अस्पष्टता के बीच मतलब की हमारी लगातार खोज, खामोशी में मौजूदगी को समझने की हमारी आदत।

पूरी तरह से, यह हिस्सा एब्स्ट्रैक्ट पेंटिंग को एक गहरी इंसानी प्रैक्टिस के तौर पर फिर से दिखाता है, इस गलत सोच का मुकाबला करते हुए कि एब्स्ट्रैक्टेशन ठंडा, अलग या पूरी तरह से फॉर्मल होता है। इसके बजाय, यह बताता है कि एब्स्ट्रैक्टेशन इंसानी मौजूदगी का सबूत है क्योंकि यह दिखाने की सीमाओं से परे काम करता है। पहचाने जा सकने वाले रूप की गैर-मौजूदगी मौजूदगी का रास्ता बन जाती है, जिससे इमोशन, याद और कल्पना देखने की जगह पर कब्ज़ा कर लेती है। आखिर में, “गायब होने का दायरा” खालीपन नहीं बल्कि संभावनाओं का एक इलाका बन जाता है—एक ऐसी जगह जहाँ अनदेखे इंसान को साफ तौर पर, अगर चुपचाप, महसूस किया जाता है।

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